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क्रांतिकारी धरती बलिया से उठी व्यवस्था परिवर्तन की हुंकार


बलिया (उत्तर प्रदेश) । अमर शहीद मंगल पांडे की जन्मस्थली नगवां से एक बार फिर अन्याय और फिजूलखर्ची के विरुद्ध बिगुल फूंका गया है। ‘मंगल पांडे विचार मंच’ ने देश के महामहिम राष्ट्रपति को संबोधित एक व्यापक अपील जारी करते हुए राजनेताओं और अधिकारियों की सुरक्षा के नाम पर हो रहे भारी-भरकम खर्च और सुरक्षा बलों के दुरुपयोग पर गहरी चिंता व्यक्त की है।
मंच के अध्यक्ष श्री कृष्णकांत पाठक ने वर्तमान राजनीतिक परिवेश पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि आज के दौर में Y, Z और Z+ श्रेणी की सुरक्षा राजनेताओं के लिए अपनी जान के खतरे से अधिक उनके रसूख और सामाजिक रुतबे (Status Symbol) का पैमाना बन गई है। यह विडंबना है कि जो नेता जनता की सेवा का संकल्प लेकर राजनीति में आते हैं, पद मिलते ही उन्हें उसी जनता से अपनी जान का खतरा सताने लगता है।
एक-एक नेता की सुरक्षा में पैरा मिलिट्री फोर्स और पुलिस के दर्जनों जवान तैनात रहते हैं। इन सुरक्षा घेरों पर होने वाला अरबों रुपये का खर्च सीधे तौर पर भारत की आम जनता के टैक्स का पैसा है। मंच का तर्क है कि जनता की गाढ़ी कमाई का यह पैसा नेताओं के तामझाम के बजाय देश के बुनियादी ढांचे, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे विकास कार्यों में लगना चाहिए।आज स्थिति यह है कि वीआईपी (VIP) सुरक्षा में तैनात सुरक्षाकर्मियों की संख्या देश के कई महत्वपूर्ण पुलिस स्टेशनों में तैनात कुल बल से भी अधिक है। एक तरफ आम आदमी की सुरक्षा के लिए पुलिस के पास संसाधनों और जनशक्ति की कमी है, वहीं दूसरी तरफ नेताओं के आगे-पीछे सुरक्षाबलों का काफिला चलता है।कृष्णकांत पाठक जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि राजनीति सेवा का माध्यम है, तो भय कैसा? उन्होंने सरकार और प्रशासन के समक्ष अपनी बात रखते हुए कहा कि हर राजनेता की सुरक्षा की वास्तविक खतरे के आधार पर निष्पक्ष समीक्षा हो, न कि पद के आधार पर।यदि किसी राजनेता को लगता है कि उसे अतिरिक्त सुरक्षा की आवश्यकता है, तो उसका खर्च वह अपने निजी वेतन या कोष से वहन करे। सरकारी खजाने पर इसका बोझ डालना अनैतिक है।अनावश्यक सुरक्षा घेरों में कटौती कर उन जवानों को थानों और संवेदनशील क्षेत्रों में तैनात किया जाए, ताकि आम नागरिक स्वयं को सुरक्षित महसूस कर सके।
“जब मंगल पांडे ने देश के लिए अपना बलिदान दिया, तो उनका उद्देश्य एक ऐसा भारत बनाना था जहाँ व्यवस्था जनहित में हो, न कि कुछ खास लोगों की सुख-सुविधा के लिए। आज नेताओं और जनता के बीच सुरक्षा की यह दीवार उस लोकतांत्रिक भावना का अपमान है।बलिया की मिट्टी का स्वभाव ही क्रांति है। मंगल पांडे विचार मंच की यह आवाज केवल एक सुझाव नहीं, बल्कि उस आम आदमी की पीड़ा है जो हर दिन अपनी मेहनत की कमाई को सत्ता के गलियारों में बर्बाद होते देखता है। यदि महामहिम राष्ट्रपति इस दिशा में ठोस कदम उठाते हैं, तो यह न केवल देश के विकास को गति देगा, बल्कि राजनीति में ‘सादगी’ और ‘जवाबदेही’ के एक नए युग की शुरुआत होगी।
मंगल पांडे विचार मंच ने संकल्प लिया है कि जब तक इस फिजूलखर्ची पर लगाम नहीं लगती, यह वैचारिक आंदोलन जारी रहेगा।

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