
दुबहड़(बलिया)। आज के दौर में भोजपुरी संगीत की दुनिया में तेजी से बढ़ रही अश्लीलता समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है। खासकर युवा वर्ग पर इसका नकारात्मक प्रभाव साफ दिखाई दे रहा है। कभी लोकसंस्कृति, संस्कार और जीवन मूल्यों की संवाहक रही भोजपुरी लोकगायकी आज फूहड़ और अश्लील गीतों के दबाव में अपनी मूल पहचान खोती नजर आ रही है। इस पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए सामाजिक चिंतक एवं गीतकार बब्बन विद्यार्थी ने कहा कि भोजपुरी गीतों का वर्तमान स्वरूप समाज को दिशा देने के बजाय उसे भटकाने का काम कर रहा है।
शिवपुर दियर नई बस्ती–ब्यासी स्थित गांधी चबूतरा पर पत्रकारों से बातचीत करते हुए बब्बन विद्यार्थी ने कहा कि पहले भोजपुरी समाज में चैता, पूर्वी, कजरी, सोरठी बृजाभार बिरहा, लचारी, विदेशिया और निर्गुण जैसे लोकगीतों का व्यापक प्रचलन था, जो न केवल मनोरंजन करते थे बल्कि जीवन के प्रति सकारात्मक सोच, सामाजिक एकता और नैतिक मूल्यों का संदेश भी देते थे। इन गीतों के माध्यम से नई पीढ़ी को संस्कार, परंपरा और संस्कृति से जोड़ा जाता था।
उन्होंने कहा कि आज स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत हो गई है। बाजारवाद और सस्ती लोकप्रियता की दौड़ में कुछ लोग भोजपुरी संगीत को अश्लीलता का माध्यम बना रहे हैं, जिससे समाज में मानसिक विकृति फैल रही है। खासकर युवा वर्ग ऐसे गीतों से प्रभावित होकर अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दूर होता जा रहा है, जो भविष्य के लिए घातक संकेत है।
बब्बन विद्यार्थी ने जोर देकर कहा कि भोजपुरी भाषा और संगीत की एक समृद्ध परंपरा रही है, जिसे बचाना हम सभी की जिम्मेदारी है। उन्होंने कलाकारों, गीतकारों और संगीत निर्माताओं से अपील की कि वे सस्ते मनोरंजन की जगह प्रेरणादायक, संस्कारयुक्त और मार्गदर्शक गीतों का सृजन करें, ताकि भोजपुरी समाज की सकारात्मक छवि फिर से स्थापित हो सके।
उन्होंने यह भी कहा कि समाज के जागरूक लोगों, साहित्यकारों और मीडिया को मिलकर अश्लीलता के खिलाफ आवाज उठानी होगी, तभी आने वाली पीढ़ी को एक स्वस्थ सांस्कृतिक वातावरण मिल पाएगा। बातचीत के दौरान मौजूद लोगों ने भी बब्बन विद्यार्थी की बातों से सहमति जताते हुए भोजपुरी लोकसंस्कृति को बचाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
इस अवसर पर डॉ. सुरेशचंद्र, विश्वनाथ पांडेय, पन्नालाल गुप्ता, रविंद्र पाल मुखिया, पवन गुप्ता, सुनील पाठक, संजय जायसवाल, पारसनाथ राम आदि उपस्थित थे l



