
दयाछपरा( बलिया)।आचार्य वह है जो आचरण युक्त हो ,आचरण हीन कभी आचार्य नहीं हो सकता। आचरण का तात्पर्य उसके गुण, कौशल ,बुद्धिमता , यानी जो सर्वगुण संपन्न हो उसे आचार्य कहते हैं ।
उक्त बातें मानस प्रचार परिषद द्वारा आयोजित 76 वें मानस सम्मेलन की रामयज्ञ में मंगलवार की रात प्रवचन के क्रम में ख्याति लब्ध संत लाभ रामभद्राचार्य उर्फ बालक बाबा ने कही बताया कि आचार्य द्रोणाचार्य जब शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। उस समय द्रुपद भी साथ में शिक्ष ग्रहण कर रहे थे। और दोनों में मित्रता हो गई। उस समय उन दोनों ने संकल्प ले लिया कि यह हम लोगों की मित्रता नहीं टूटेगी ,परंतु शिक्षा के बाद द्रुपद राजा बन गए और द्रोणाचार्य आचार्य जब द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा हो गए तो पड़ोसियों की घर दूध देखकर पीने की इच्छा की , नहीं मिलने पर किसी ने चावल पीस कर दिया। और बाद मे द्रोणाचार्य से गाय की गुहार लगाई। और मित्र द्रुपद से गाय मांगने को कहा। उस समय द्रुपद ने द्रोणाचार्य का भरी सभा में अपमान किया, वही से महाभारत की रचना हुईं। द्रोणाचार्य संकल्प ले लिए और घर न जाकर हस्तिनापुर में पांडव और कौरव पुत्र को शिक्षा देने लगे और गुरु दक्षिणा में द्रुपद को हरा कर राज्य की मांग कर दिए। अर्जुन ने द्रुपद को हराया और बंदी बनाकर द्रोणाचार्य के समीप लाए। द्रोणाचार्य ने मित्रता की याद दिला कर आधा राज्य ले लिया। वही से महाभारत की नींव पड़ गई। कथा देर रात तक चलती रही जहां श्रद्धालु नर नारी कथा रूपी सागर में गोता लगाते रहे।



