अध्यात्मकार्यक्रमबलिया

नाना प्रकार के व्यंजन अनेकों रोग और दुख के कारक : बालक बाबा

दयाछपरा( बलिया)। समस्त संसार के प्राणीयो और समुद्र की गति एक जैसे ही है। जिस प्रकार समुद्र के एक छोर पर खड़ा होने से दूसरा छोर कहीं दिखाई नहीं पड़ता उसी तरह संसार को भी कहीं एक छोर से देखेंगे तो दूसरा छोर दिखाई नहीं पड़ता।
जिस प्रकार से समुद्र देखने में बहुत सुंदर दिखाई पड़ता है उसी प्रकार से संसार भी देखने में बहुत अच्छा लगता है परंतु जिस प्रकार समुद्र का पानी खरा होता है उसी प्रकार से इस जन समुदाय में नाना प्रकार के व्यंजन कई प्रकार के रोग और दुख के कारक बनते हैं ।उक्त बातें मानस प्रचार परिषद दया छपरा द्वारा आयोजित 76वां मानस सम्मेलन के राम ज्ञानयज्ञ में सोमवार की रात ख्याति लब्ध संत रामभद्राचार्य उर्फ बालक बाबा ने कहा।
बताया कि हर पूर्णिमा के दिन समुद्र में लहरे उठती है और अपने आप विलुप्त भी होती रहती है। इसी तरह से संसार के जीवधारी में इच्छाएं हमेशा उठती रहती है और उसी को पूरा करने में मानव जीवन बर्बाद हो जाता है ।अगर मानव को कल्याण करना है तो अपने इच्छाओं को मारना होगा, प्रभु के शरण में जाने पर भोजन और वस्त्र की कमी नहीं है, परन्तु देहधारी जिसके पास घर हो गया तो बांगला खोजता है ।एक जगह नहीं तो कई जगह बनाने की सोचने लगता है ।वह भी पूरा हो जाए तो उसका डिजाइन चेंज करने के लिए जतन करता है ।इस प्रकार इच्छाए बढ़ती ही जाती है। जो कभी पूरा नहीं होती। देहधारियो को अपने इच्छाओं पर प्रतिबंध लगाकर कुछ समय निकालकर प्रभु के भजन ,मनन और शरण में जाना चाहिए ।इच्छाएं हो तो प्रभु को जानने के लिए,प्रभु को समझने के लिए, इस प्रकार प्रभु के शरण में जाने पर जीव का कल्याण हो जाएगा। कथा देर रात तक चलती रही। जहां श्रद्धालु नर नारी कथा रूपी सागर में गोता लगाते रहे।

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