
दयाछपरा( बलिया)।“कहो कहां लगी नाम बढ़ाई ।राम न सकही राम गुण गाई।।
राम के नाम का महत्व राम भी नहीं बता पाएंगे।बाल्मीकि उल्टा नाम का जाप करके ब्रह्म के समान हो गए।हम लोग तो साधारण मानव है।उक्त बातें मानस प्रचार परिषद दयाछपरा द्वारा आयोजित 76 वाँ मानस सम्मेलन में रविवार की रात आशीष जी महाराज ने कही।बताया कि रामचरित मानस ऐसा ग्रंथ है जिसे पढ़ने व सुनने से भक्त परम विश्राम प्राप्त करता है।अर्थात जीवन मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। वहीं सिद्ध संत रामभद्राचार्य उर्फ बालक बाबा ने कहा कि भक्त चार प्रकार के होते है और प्रभु चारों प्रकार की भक्तों का समय-समय पर कल्याण करते हैं ।पहले अर्त भक्त ,दूसरा अर्थार्थी ,तीसरा जिज्ञासु और चौथा ज्ञानी भक्त होते हैं। बताया कि आर्त यानी दुखी भक्त जो अपने दुख से परेशान होकर प्रभु के शरण में जाता है और प्रभु उनका कल्याण करते हैं। दूसरा अर्थार्थी जो इच्छा लेकर प्रभु के शरण में जाता है कि मेरा यह इच्छा पूरा हो जाए वह इच्छा पूरा हो जाए। तीसरा जिज्ञासु भक्त जो जानने की प्रवृति रखता है। प्रभु के विषय में ज्यादा से ज्यादा जान ले और उसके द्वारा अपना तथा समाज का कल्याण कर ले उसे जिज्ञासु भक्त के श्रेणी में रखा गया है । चौथा ज्ञानी भक्त जिसे सर्वश्रेष्ठ सर्वोपरि माना गया है ।जो ज्ञान के द्वारा प्रभु के पास पहुंच जाता है। बताया कि रामचरित मानस में आर्त भक्त विभीषण है।अर्थार्थी सुग्रीव है,जिज्ञासु शबरी है और ज्ञानी भक्त हनुमान जी है। इसी प्रकार इस कली काल में भी अन्य तीन भक्त का तो लोप हो गया है पर आर्त भक्त की संख्या बढ़ गई है। जो चारों तरफ से अपने को असहाय मानने लगता है। वही प्रभु के शरण में जाता है।जिज्ञासु की श्रेणी में कुछ साधु संत रह गए हैं।अन्यथा बाकी दो प्रकार के भक्तों का अभाव समाज में देखने को मिलता है। कथा देर रात तक चलती रही जहां श्रद्धालु नर नारी कथा रूपी सागर में गोता लगाते रहे।



