
लालगंज (बलिया)। महान तपस्वी संत सुदिष्ट बाबा के समाधि स्थल पर “ग्रामीण परिवेश में आयोजित यह मेला अपनी भव्यता, परंपरा और लोकसंस्कृति के कारण हर वर्ष लोगों को आकर्षित करता है।धनुष यज्ञ मेला भव्यता का ऐसा संगम है,जहाँ आस्था, संस्कृति और जनसमूह एक साथ दिखाई देता है। मेले की भव्यता यह बताने के लिए काफी है कि ग्रामीण परंपराएं आज भी पूरी शान से जीवित हैं।”यह मेला ब्यापार का ही नहीं एक दूजे का मिलन केन्द्र का प्रतीक भी है जहाँ अपने और बेगाने सभी एक दूसरे से मिलते जुलते है ।
उद्घाटन के तीसरे रविवार को मेला परिसर में उमड़ी भारी भीड़ ने पूरे वातावरण को उत्सवमय बना दिया। मेला मे चारों ओर सजी-धजी दुकानों पर सुबह से बढ़ती भीड़ और लोगो की चहल पहल दोपहर तक विशाल जनसैलाब में बदल गई। दूर-दराज़ से आयें लोगों ने मेले का भरपूर आनंद लिया। महिलाओं में मेले को लेकर खास उत्साह देखने को मिला।

घूंघट की ओट में आई महिलाएं मेले में कदम रखते ही खरीदारी और मनोरंजन में मग्न हो गईं। मेले में ग्रामीण जीवन से जुड़े लोहे के बर्तन—कड़ाही, तवा, हंसुआ और देसी चूल्हों की मांग भी काफ़ी बढ़ी। दुकानदारों के चेहरे पर रौनक दिखी, क्योंकि एक ही दिन में बिक्री कई गुना बढ़ गई।
बांस से बने शिल्प उत्पादों ने भी लोगों का ध्यान खींचा। देवी-देवताओं की मूर्तियों सहित बांस से बनी विभिन्न वस्तुओं की भारी मांग रही। इन उत्पादों ने आत्मनिर्भर ग्रामीण जीवन की झलक पेश की और कारीगरों को अच्छा लाभ मिला।
मेले में लोकल फॉर वोकल की भावना साफ नजर आई। हाथ से बने ग्रामीण उत्पाद, आर्ट एंड क्राफ्ट गैलरी, पेंटिंग, कपड़े, कपड़े के झोले, चप्पल समेत कई स्वदेशी वस्तुएं लोगों को खूब पसंद आ रही हैं। वहीं फूड स्टॉल पर देसी व्यंजन—लिट्टी-चोखा, सतुआ, भुजा, अचार और गुड़ की जलेबी के साथ फ्री मे मिलती मसालेदार सब्जी जिलेबी का जायका बढ़ा देती जिसकी जबरदस्त मांग रही । मेले की भीड देख दुकानदार काफी उत्साहित दिखे ।



