
दयाछपरा(बलिया)। सतयुग ,द्वापर,त्रेता से भी धार्मिक दृष्टि से कलयुग उत्तम है।अन्य युगों में जो फल बरसों बरस तपस्या के बाद मिलता था वह कलिकाल में भगवान के नाम स्मरण मात्र से मिल जाता है। हमारे सनातन धर्म में पहले ही आरक्षण दे दिया गया था,जो आज भी कायम है।
उक्त बातें स्थानीय ग्राम सभा के मां काली स्थान पर आयोजित शतचंडी महायज्ञ में पधारे महान संत रामभद्राचार्य उर्फ बालक बाबा ने कही।बताया कि जो 4 से 5 घंटा परिश्रम करके पंडित, ब्राह्मण पूजा करते हैं। वही फल शूद्र अगर सुबह के समय मंदिर की गुंबद का दर्शन कर ले तो उसे मिल जाता है ।यही नहीं महिलाओं के लिए बताया कि नारी अगर केवल पति का सेवा कर ले तो उसे कोई पूजा पाठ करने की जरूरत नहीं है। मात्र पति सेवा से नारी को यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है। साथ ही नारी के द्वारा किए गए धर्म में बटवारा नहीं होता जबकि पुरुष द्वारा किए गए धर्म का आधा फल उनके पत्नी को स्वतः मिल जाता है।बताया कि दुख का मूल कारण मनुष्य द्वारा अपने कुल देवता को छोड़कर अनेक देवी देवताओं के पूजा करना मुख्य कारण है। कुल देवता का पूजन प्रतिदिन नहीं तो कम से कम साल में एक बार जरूर होना चाहिए जबकि अधिकांश लोगों को यह भी पता नहीं है कि हमारे कुल देवता कौन है?उनका वेद क्या है? उनका उपवेद क्या है? यही जानकारी नहीं है, पहले अनपढ़ ग्रामीण जनता होती थी फिर भी गृहस्थ जीवन में नया अन्न होने पर कुल देवता के लिए ग्राम देवता के लिए गुरु के लिए कुछ अंश निकालकर रखते थे और उस अन्न से कुलदेवता का पूजन करते थे लेकिन आज के मशीनी युग में यह कहीं देखने को नहीं मिलता। कथा देर तक चलती रही जहां श्रद्धालु नर नारी पुण्य लाभ प्राप्त करते रहे।



