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फाइलों में दबी कटान पीड़ितों की उम्मीद,कड़कड़ाती ठंड में काट रहे जिंदगी


दयाछपरा(बलिया)। घर किसे कहते हैं, दर बदर ठोकरें खाने के बाद पता चला।बेघर होना क्या है? दिन महीने गुजरते गए लेकिन एन एच 31 के किनारे व तटबंधों की पटरियों पर गुजर कर रहे शासन स्तर से एक अदद छत तक का सहारा अब तक नहीं मिला।गंगा की उफनती लहरों ने विगत तीन महीने पहले पतित पावनी मां गंगा के दक्षिण दिशा में बसे नौरंगा गांव को तो मानो निगल ही ली। चक्की नौरंगा के आशियानों पर गंगा की लहरों ने 21 जुलाई को कहर बरपाना शुरू किया,देखते ही देखते 134 परिवारों का घर नदी में समाते गए।विडंबना यह है कि आजतक पुनर्वास के नाम पर सिर्फ और सिर्फ आश्वाशन ही मिला।कटान पीड़ितों को पुनर्वास योजना के अंतर्गत पट्टे का आवंटन अब तक नसीब नहीं हो सका।शासन प्रशासन के लोग इस बेघर व बेसहारा परिवारों को हाल तक जानने की जरूरत भी नहीं महसूस की।कटान पीड़ितों भीषण ठंड में खुले आसमान के नीचे अपना रात काट रहे हैं।मानो सबकी जिंदगी प्रशासनिक फाइलों के नीचे दब कर रह गई हो।
जमीन आवंटन के संबंध में उपजिलाधिकारी बैरिया आलोक प्रताप सिंह से पूछने पर बताए कि जमीन की तलाश जारी है उपलब्ध होते ही कटान पीड़ितों को आवंटन कर बसाने का काम किया जाएगा।

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