
लालगंज (बलिया)।“मनुष्य द्वारा पुण्य क्षेत्र में जो पाप किया जाता है, वह सहस्र गुना फल देता है।” जहाँ साधना, सेवा, धर्म और पवित्रता का वातावरण होता है तीर्थ स्थल, मंदिर अथवा आश्रम—वहाँ किया गया गलत कर्म साधारण स्थानों की अपेक्षा कहीं अधिक गंभीर माना जाता है और उसका दुष्परिणाम भी उसी अनुपात में बढ़ जाता है।
उक्त विचार श्री श्री 1008 श्री स्वामी हरिहरानंद जी महाराज ने शनिवार को मुरारपट्टी गांव में संजय तिवारी के यहां आयोजित हनुमान चालीसा पाठ के समापन अवसर पर श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
स्वामी जी ने कहा कि जिसका पुण्य कम और पाप अधिक होता है, वह पहले अपने पुण्य का भोग करता है। प्रत्येक मनुष्य को अपने किए गए कर्मों के अनुसार फल भोगना ही पड़ता है। जैसा कर्म किया जाता है, वैसा ही फल प्राप्त होता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ है, इसे पाकर अच्छे कर्म कर अपने जीवन को सफल बनाना चाहिए।
स्वामी हरिहरानंद जी महाराज ने कहा कि योग, तप, जप और भजन सभी साधन हैं, लेकिन कलियुग में सबसे सरल और सुगम साधना नाम जप है। नाम ही कलियुग का आधार है। चलते-फिरते, उठते-बैठते, सुख-दुःख में यदि मन में ईश्वर का नाम बना रहे तो यही सबसे सरल और प्रभावी साधना मानी जाती है।
उन्होंने कहा कि नाम जप के लिए न समय की बाध्यता है, न स्थान की और न ही किसी विशेष विधि की आवश्यकता है—केवल सच्चा भाव होना चाहिए। स्वामी जी ने श्रद्धालुओं को अपनी आयु और सामर्थ्य के अनुसार प्रतिदिन दो से पाँच घंटे तक नाम जप करने की सलाह दी।



