रामानुज आश्रम में श्रीमद्भागवत कथा के छठवें दिन रुक्मिणी विवाह व कंस वध प्रसंग,भक्ति से गूंजा पंडाल

लालगंज (बलिया)। श्री श्री 1008 श्री कमल नयन ब्रह्मचारी जी की 11वीं पुण्यतिथि के अवसर पर रामानुज आश्रम, शिवपुर कपूर दीयर सेमरिया में आयोजित श्रीमद्भागवत महापुराण कथा सह लक्ष्मी नारायण महायज्ञ के छठवें दिन भक्तिमय वातावरण बना रहा। वृंदावन धाम से पधारे प्रसिद्ध कथावाचक जगद्गुरु रामानुजाचार्य चतुर्भुजाचार्य स्वामी जी ने भगवान श्रीकृष्ण एवं देवी रुक्मिणी विवाह प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया।
कथा में स्वामी जी ने बताया कि देवी रुक्मिणी विदर्भ नरेश भीष्मक की पुत्री थीं और उन्होंने मन, वचन व कर्म से भगवान श्रीकृष्ण को ही अपना पति स्वीकार किया था। रुक्मी द्वारा जबरन शिशुपाल से विवाह तय किए जाने पर रुक्मिणी ने भगवान श्रीकृष्ण को संदेश भेजकर अपनी रक्षा की प्रार्थना की। भक्त की पुकार स्वीकार करते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी का हरण कर विधिपूर्वक उनसे विवाह किया। इस प्रसंग के माध्यम से स्वामी जी ने संदेश दिया कि सच्ची भक्ति, अटूट विश्वास और धर्म की सदैव विजय होती है तथा भगवान अपने भक्त की लाज स्वयं रखते हैं।

कथा व्यास ने आगे कहा कि श्रीमद्भागवत कथा केवल श्रवण का विषय नहीं है, बल्कि यह जीवन को सही दिशा देने वाला दिव्य मार्गदर्शन है। रासलीला प्रसंग का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि रासलीला आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है, जिसमें सांसारिक आकर्षण नहीं, बल्कि शुद्ध भक्ति का भाव निहित है। जो मनुष्य अहंकार, लोभ और मोह का त्याग कर भगवान की शरण में जाता है, उसका जीवन स्वतः ही पवित्र हो जाता है।
इसके पश्चात कंस वध प्रसंग सुनाते हुए कथा व्यास ने कहा कि अधर्म चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसका अंत निश्चित है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कंस वध से यह संदेश मिलता है कि अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करना ही सच्चा धर्म है।

यज्ञ के आयोजक जगद्गुरु रामानुजाचार्य श्री स्वामी राधाकृष्णाचार्य जी ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि कलियुग में हरि नाम स्मरण ही सबसे बड़ा साधन है। उन्होंने कहा कि हरि नाम के बिना मानव जीवन अधूरा है और जो व्यक्ति प्रतिदिन भगवान का नाम स्मरण करता है, उसके सभी कष्ट स्वतः दूर हो जाते हैं।
प्रवचन के दौरान श्रद्धालु भावविभोर हो उठे और पूरा पंडाल “हरे कृष्ण-हरे कृष्ण” एवं “राधे-राधे” के जयघोष से गूंज उठा। अंत में आरती का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लेकर पुण्य लाभ अर्जित किया।



